शिक्षा नवजीवन सृजन या व्यापार

Lavkush Singh
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(माँ होने के नाते मेरे स्वयं के अनुभव पर आधारित)


शिक्षा को हमेशा से समाज की आत्मा माना गया है। पहले शिक्षा केवल ज्ञान का साधन नहीं, बल्कि जीवन जीने का मार्ग और चरित्र निर्माण का आधार थी। शिक्षक को गुरु देवो भव का दर्जा दिया जाता था और बच्चे उनके चरणों में बैठकर केवल अक्षर नहीं, बल्कि संस्कार भी ग्रहण करते थे। परंतु आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं।

मैं स्वयं दो बच्चों की माँ हूँ और प्रत्यक्ष रूप से देख रही हूँ कि शिक्षा का स्वरूप अब वैसा नहीं रहा। बच्चे अब पहले की तरह अपने शिक्षकों का सम्मान नहीं करते और शिक्षकों में भी पहले जैसा धैर्य, करुणा और समर्पण का भाव उतना प्रखर नहीं दिखता। शिक्षा का वातावरण एक गहरे बदलाव से गुज़र रहा है, और यही सवाल उठाता है – क्या आज की शिक्षा नवजीवन का सृजन कर रही है या केवल व्यापार बन गई है?

शिक्षा में आए बदलाव

1. व्यावसायिकता का बोझ – स्कूल, कॉलेज और कोचिंग संस्थान अब फीस और सुविधाओं की होड़ में हैं। शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान से अधिक कमाई बनता जा रहा है।


2. सम्मान की कमी – बच्चों के मन में गुरु के प्रति श्रद्धा पहले जैसी नहीं रही। अब शिक्षक केवल नौकरी करने वाले पेशेवर नज़र आते हैं, "मार्गदर्शक" नहीं।


3. डिजिटल प्रभाव – मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने बच्चों की सोच को बहुत प्रभावित किया है। ध्यान, धैर्य और अनुशासन जैसी बातें कम हो रही हैं।


4. माता-पिता की व्यस्तता – घर पर संस्कारों और अनुशासन की शिक्षा कमजोर पड़ रही है।


मेरे अनुसार इस समस्या के समाधान और उपाय--


1. माता-पिता की भूमिका


बच्चों को घर पर सिखाएँ कि शिक्षक का सम्मान करना क्यों आवश्यक है।

शिक्षा को केवल अंकों और पैकेज तक सीमित न करें, बल्कि अच्छे इंसान बनने पर बल दें।

बच्चों के साथ संवाद करें और शिक्षा को उनके लिए "जीवन जीने का साधन" बनाएं, केवल करियर का ज़रिया नहीं।


2. शिक्षकों की भूमिका


शिक्षा को केवल नौकरी न समझें, बल्कि इसे "सेवा" के भाव से निभाएँ। बच्चों के साथ धैर्य और करुणा का व्यवहार करें, ताकि वे आत्मीयता महसूस करें। केवल किताबें नहीं, बल्कि जीवन के मूल्य और संस्कार भी कक्षा में शामिल करें।


3. बच्चों की भूमिका


बच्चे भी समझें कि शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला दीपक है। गुरु का आदर करें, क्योंकि गुरु ही वह सेतु हैं जो ज्ञान और जीवन के बीच जोड़ते हैं।

अनुशासन, विनम्रता और ईमानदारी को अपनी आदत बनाएँ।


4. समाज की भूमिका


शिक्षा को पूरी तरह बाज़ार बनने से रोकना होगा। ऐसे में प्रयास करने होंगे जिनसे शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावक तीनों मिलकर शिक्षा को पवित्र कर्म समझें।

समाज में फिर से "गुरु-शिष्य परंपरा" को सम्मान मिले, इसके लिए जागरूकता बढ़ानी होगी।


 निष्कर्ष


आज की शिक्षा निश्चित ही चुनौतियों से घिरी है। लेकिन अगर माता-पिता, शिक्षक और बच्चे अपनी-अपनी भूमिका को समझें और मिलकर प्रयास करें, तो यह व्यापार की जगह फिर से नवजीवन सृजन का साधन बन सकती है।


*असली शिक्षा वही है जो केवल बुद्धि को नहीं, बल्कि हृदय और आत्मा को भी प्रकाशित करे।*


नेहा वार्ष्णेय 

दुर्ग छत्तीसगढ़

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